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दीपक-बाती झूम रहे हैं : कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, October 21, 2011

दीपक-बाती  झूम रहे हैं


गीत सुनाते 
चहकें हिलमिल
बच्चे घर के आँगन में!
ज्यों चहकें 
सतरंगे बादल
नीलगगन में सावन में!

सबके ओठों 
पर बिखरी
हैं खीलों-सी मुस्कानें!
और सजी हैं 
आँखों में
सपनों की मधुर दुकानें!

दीपक-बाती 
झूम रहे हैं
बँधे प्रेम के बंधन में!
किलक रहीं 
फुलझड़ी-सरीखी
झिलमिल ख़ुशियाँ हर मन में !

रावेंद्रकुमार रवि

6 टिप्पणियाँ:

रविकर October 22, 2011 at 9:27 PM  

हमें उजाला लाना ही है लव तो होता पगला
दीपक बाती झूम रहे हैं, इक पिछला इक अगला
दीवाली पर दीप जले कुछ ऐसे, ऐसे, उजला
कहाँ रौशनी खातिर देखो, मोम जरा सा पिघला

लिंक आपकी रचना का है
अगर नहीं इस प्रस्तुति में,
चर्चा-मंच घूमने यूँ ही,
आप नहीं क्या आयेंगे ??
चर्चा-मंच ६७६ रविवार

http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) October 23, 2011 at 11:02 AM  

बहुत सुन्दर गीत ..दीपावली की शुभकामनायें

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') October 23, 2011 at 5:04 PM  

बहुत प्यारा गीत...
सादर बधाई....

चन्दन..... October 23, 2011 at 8:13 PM  

बहुत हि सुन्दर और प्यारा गीत!
दीवाली कि शुभकामनाएं!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) October 28, 2011 at 9:56 PM  

सुन्दर रचना!
आपको और आपके पूरे परिवार को दीपावली, गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएं!

कविता रावत November 12, 2011 at 5:22 PM  

bahut sundar geet..

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