नन्हे दोस्तों को समर्पित मेरा ब्लॉग

दिल ही दिल में : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, April 22, 2011

दिल ही दिल में
हम
दिल से भी
कुछ कहते हैं,

तुम
उसको दिल से
सुन लेना!

सच में
यदि आ न सको,
मत आना!

दिल ही
दिल में
मिल लेना!
--
रावेंद्रकुमार रवि

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मंदिर की ख़ुशबू : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Monday, February 14, 2011

मंदिर की ख़ुशबू


घाटी में बसा हुआ गोपेश्वर पहाड़ियों के ऊपर बसे गाँवों से देखने पर बहुत सुंदर लगता है । घाटी के बीच में मोबाइल का टॉवर लगा हुआ है । टॉवर के पास भगवान शिव का मंदिर है । यहाँ के शिवजी गोपीनाथ के नाम से जाने जाते हैं । मंदिर काले पत्थरों से बना हुआ है । काले पत्थर धूप में चमचमा रहे हैं । गुनगुनी धूप बहुत अच्छी लग रही है । आसमान बिल्कुल साफ है । मंदिर के आँगन में महाशिवरात्रि का मेला लगा है । मेले का लाइव टेलीकास्ट चल रहा है । कुछ लोग घर में बैठे-बैठे टीवी पर मेला देख रहे हैं ।

चंदर भी टीवी देख रहा है । यह बात अलग है कि वह मेला कम देख रहा है और मेले में किसी को ढूँढ ज्यादा रहा है । दो घंटे बीत जाने के बाद भी जब उसे सुधा कहीं दिखाई नहीं दी, तो उसके सब्र का बाँध टूट गया । उसने अपने मोबाइल से सुधा का नंबर डायल किया - 9897614866 और कान से लगा लिया । एक ही डायल में फोन लग गया और उसे सुधा की हेलो ट्यून सुनाई देने लगी -


‘‘निगाहें निगाहों से मिलाकर तो देखो ... ...
नए लोगों से रिश्ता बनाकर तो देखो ... ...
जो है दिल में उसे कर दो बयाँ ... ...
ख़ुद को एक बार जताकर तो देखो ... ...
आसमाँ सिमट जाएगा तुम्हारे आगोश में ... ...
चाहत की बाहें फैलाकर तो देखो ... ...
दिल की बात बताकर तो देखो ... ... ’’

उधर सुधा के मोबाइल से भी इस गाने की रिंग-टोन बज उठी - ‘‘मेरे प्यार की आवाज पर चली आना ... ...’’
जैसे ही उसने यह एसाइन रिंग-टोन सुनी, वह समझ गई कि चंदर का फोन है । उसका मन भी गुनगुना उठा - ‘‘मैं आ रही हूँ प्यार की आवाज पर, ये प्यार-भरा नगमा तुम फिर से गुनगुनाना ... ... ’’


सुधा ने एक हाथ से बुरांश के लाल-गुलाबी फूलों से लदी टहनी पकड़ी । दूसरे हाथ में पकड़े मोबाइल को कान से लगाया और फोन रिसीव करते हुए बहुत मीठे-से पूछा - ‘‘क्या है ?’’

‘‘तृम मेला देखने क्यों नहीं आईं ?’’ - उधर से भी बहुत मीठी आवाज़ आई ।

फिर वे दोनों एक-दूसरे के कानों में रस घोलने लगे ।

‘‘तुम भी तो नहीं आए ?’’

‘‘तो क्या तुम मेले से बोल रही हो ?’’

‘‘नहीं, मैं तो टीवी में तुम्हें ढूँढ रही थी, पर तुम कहीं दिखाई ही नहीं दिए ।’’

‘‘धत्त तेरे की ! मैं भी तो तुम्हें टीवी में ढूँढ रहा था, पर तुम भी कहीं दिखाई नहीं दीं ।’’

‘‘मैंने सोचा, जब तुम दिखाई दोगे, तभी मैं भी आ जाऊँगी ।’’

‘‘मैंने भी तो यही सोचा ।’’

‘‘हो गए दोनों पागल !’’

‘‘अब क्या करें ?’’

‘‘सारा मेला तो टीवी पर ही देख लिया ... ... ’’

‘‘और अब तुम्हारी खिलखिलाहट भी सुन ली ... ... मिलने का क्या है ... ... अपना मेला तो कभी भी हो सकता है ... ... ’’

‘‘अरे, बुद्धू ! आज की बात ही कुछ और है । और फिर मंदिर की ख़ुशबू लेने के लिए तो मेले जाना ही पड़ेगा न ?’’

‘‘तो फिर देर किस बात की है ... ... आ जाओ जल्दी से ... ... थोड़ी-सी ख़ुशबू मुझे भी मिल जाएगी ... ... तुम्हारी ... ... मेरी साँसों को महकाने के लिए !’’

यह सुनते ही सुधा उड़ चली, मंदिर की ओर । किसी सुंदर-सी परी की तरह । पहाड़ी ढलान पर दौड़ते हुए ।

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रावेंद्रकुमार रवि
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प्रीत वो मनमीत की : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, February 6, 2011

प्रीत वो मनमीत की है


हरीतिमा बसंत की है
मधुर गीत गा रही!
प्रीत वो मनमीत की है
बहुत याद आ रही!

खेतों में सरसों की
सरस रहीं क्यारियाँ!
बाट जोहें साजन की
गाँव की कुमारियाँ!
जो अपनी मुस्की से
मुझको रिझाते हैं,
मुझको तो उन अधरों
की महक लुभा रही!
प्रीत वो मनमीत की .. .. .. .

चलती है मस्त पवन
करती शैतानियाँ!
गुप-चुप कुछ कहती हैं
चुनरी की बानियाँ!
करती है नयनों से
चंचल संकेत जो,
मुझको वो प्यारी-सी
झलक याद आ रही!
प्रीत वो मनमीत की .. .. .. .

मौसम ने छेड़ी हैं
स्वप्निल शहनाइयाँ!
तन-मन पर थिरक रहीं
प्यार की कहानियाँ!
जो अपनी रुनझुन से
बेसुध कर जाती है,
मुझको तो पायल की
वो झनक बुला रही!
प्रीत वो मनमीत की .. .. .. .

रावेंद्रकुमार रवि

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खेतों की मेढ़ों पर


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समाधान : व्यंग्य कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, January 30, 2011



समाधान



"समधीजी!
कुछ तो सोचिए!
एक साथ इतना अधिक
दहेज मत माँगिए!"
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"कोई बात नहीं!
क्या सोचना?
सामान अभी ले लेंगे,
नोट किस्तों में दे देना!" 

रावेंद्रकुमार रवि 
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वह मेरा दोस्त है : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, January 20, 2011

वह मेरा दोस्त है 
सुसुम के पापा उसके लिए चार पहियोंवाली साइकिल लाए । साइकिल कई रंगों से सजी थी । साइकिल के पिछले बड़े पहिए के साथ, दोनों ओर, दो छोटे पहिए और लगे थे । ये पहिए साइकिल को गिरने से बचाते थे । उसमें हैंडिल के बीच में आगे की तरफ एक सुंदर-सी डोलची लगी हुई थी । सुनहरे रंग की डोलची, जिसमें वह अपनी गुड़िया को बैठा सकती थी । 

साइकिल पर बैठकर सुसुम शाम को पार्क में घूम रही थी । वह अपनी गुड़िया से बातें भी करती जा रही थी - ‘‘अभी तुम छोटी हो । बड़ी हो जाओगी, तब मैं तुम्हें भी साइकिल चलाने के लिए दूँगी ।’’

अचानक उसे लगा कि कोई उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है । उसने मुड़कर देखा - ‘‘अरे, मानुर !’’ 
मानुर कहते ही उसकी साइकिल लड़खड़ाई और वह गिरने लगी । लेकिन गिरी नहीं । मानुर ने पीछे से साइकिल का कैरियर पकड़ लिया । गुड़िया भी गिरते-गिरते बची । सुसुम ने तुरंत उसे सँभाल लिया ।

‘‘मुझे भी दो न !’’ - मानुर ने इतने प्यार से कहा कि वह उसे मना नहीं कर पाई और फिर उसने उसे गिरने से भी तो बचाया था । 

‘‘अरे, क्या कर रहे हो ? धीरे चलाओ न !’’ - मानुर ने साइकिल पर बैठते ही उसे तेज़ भगाने की कोशिश की, तो सुसुम ने उसे रोका । 

‘‘अच्छा ठीक है ।’’ - मानुर ने न चाहते हुए भी तुरंत उसकी बात मान ली । नहीं तो, दुबारा कैसे मिलती साइकिल ?

सुसुम की माँ को पता चला, तो उन्होंने उसे डाँटा । उसकी समझ में नहीं आया - ‘क्यों डाँटा ?’

दूसरे दिन मानुर ने फिर से साइकिल माँगी, तो सुसुम ने कहा - ‘‘माँ डाँटती है । तुम अपने पापा से मँगा लो ।’’

मानुर ने बताया - ‘‘कहा तो था, पर नहीं लाते ।’’

यह सुनते ही सुसुम की नज़र मानुर की कमीज पर पड़ी । उसने हमेशा उसे वही कमीज पहने हुए देखा है । 

उसे ध्यान आया - ‘मानुर के सभी भाई-बहनों का भी यही हाल है ।’ 

वह मानुर के चेहरे पर एक नज़र डालते हुए आगे बढ़ गई और मानुर अपनी जगह पर खड़ा उसे देखता रह गया ।
सुसुम आगे तो बढ़ गई, पर उसका मन पीछे ही रहा । वह सोचती जा रही थी - ‘मानुर रोज़ एक ही शर्ट पहनता   है । उसके पापा साइकिल नहीं दिलाते । वह दूसरे स्कूल जाता है । पैदल-पैदल । मुझे लेने स्कूल की बस आती है ।’

फिर उसे याद आया - ‘टीवीवाले बताते हैं कि बच्चे कम होने चाहिए । पापा भी कहते हैं कि ज़्यादा बच्चों से ख़र्चा ज़्यादा होता है ।’

अब उसकी समझ में आया - ‘मानुर के मम्मी-पापा के पास ज़्यादा बच्चे हैं, इसलिए ख़र्चा ज़्यादा होता है । तभी उसके पापा साइकिल नहीं ला पाते ।’

घर में घुसने के बाद उसने साइकिल खड़ी की । गुड़िया को गोद में लिया और उससे बोली - ‘‘अब मैं माँ से कहूँगी - मुझे डाँटें नहीं । मैं मानुर को साइकिल दे दिया करूँगी । वह मेरा दोस्त है ।’’ 
-- रावेंद्रकुमार रवि --

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आए कैसे बसंत : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, January 13, 2011

आए कैसे बसंत?
--
मौसम की माया है,
धुंध-भरा साया है –
आए कैसे बसंत?

रोज़-रोज़ काट रहे
हर टहनी छाँट रहे!
घोंसला बनाने को
कैसे वे आएँगे?
सुन उनका कल-कूजन
क्या अब अँखुआएँगे?

नन्हे उन पंखों को
पाए कैसे अनंत?
स्वरलहरी डूब रही
गाए कैसे बसंत?
आए कैसे बसंत?

कचरे से पाट रहे
ख़ुशियों को डाँट रहे!
महक भरे झोंके अब
कैसे आ पाएँगे?
नेह-भरे सपने अब
कैसे मुस्काएँगे?

सपनों का इंद्रधनुष
पाए कैसे दिगंत?
मन-कुंठा फूल रही
भाए कैसे बसंत?
आए कैसे बसंत?
--
रावेंद्रकुमार रवि

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