नन्हे दोस्तों को समर्पित मेरा ब्लॉग

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दूरभाष : नई कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, July 17, 2011

दूरभाष


हैलो, सागर!

मैं वर्षा बोल रही हूँ!
मैं संध्या के साथ
आ रही हूँ,
तुमसे मिलने!

वसुधा से कहना
वह प्रतीक्षा न करे!
आकाश उससे
कभी नहीं मिलेगा!

वैसे
समीर के हाथों
मैंने संदेश भेज दिया है
नीरद व्याकुल है
उससे मिलने के लिए
गिरीश के लिए!

रावेंद्रकुमार रवि 

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अद्वितीय होता है : नई कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, June 15, 2011

अद्वितीय होता है 
 
चाहे 
कितनी भी देर में सही
पर 
जब पहनाती है प्रकृति 
कैक्टस को मुकुट
तो वह 
अद्वितीय होता है!
रावेंद्रकुमार रवि
  

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नए वर्ष की नई सुबह : नई कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, December 26, 2010

नए वर्ष की नई सुबह : कुछ झलकियाँ


कल भी मैं
सुबह पाँच बजे उठकर
पढ़ने का संकल्‍प लेकर
सोया था,
पर आज उठा वही आठ बजे ।

रोज़ की तरह -
रजाई के अंदर पड़ा-पड़ा
घड़ी का अलार्म सुनता रहा ।

नए वर्ष की नई सुबह देखने
छत पर गया, तो देखा -
पिछले कई दिनों की तरह
आज भी सूरज
कोहरे की चादर के पीछे खड़ा
टिमटिमा रहा है ।

रोज़ की तरह -
सड़क के किनारे
बत्‍तख्‍ों और मुर्गियाँ
गंदी नालियों में से
अपने लिए
सुलभ आहार खोज रहे हैं ।

चाय की दुकान पर बैठे
कुछ लोग
अखबार में घुसकर
चाय पी रहे हैं
और कुछ लोग
दुकान के आगे जल रही
धान की भूसी ताप रहे हैं ।

रोज़ की तरह -
छोटा भाई कह रहा है -
मैं आज नहीं
कल स्‍कूल जाऊँगा
और मम्‍मी
उसे ज़बरदस्‍ती तैयार कर रही हैं ।

टीवी, रेडियो, अखबार
और वेबसाइटों पर भी
कुछ नया नहीं है ।
रेडियो-टीवी के उद्‌घोषक
उसी पुराने अंदाज़ में
‘हैप्‍पी न्‍यू इयर' ज़्‍यादा
और ‘नव वर्ष मंगलमय हो'
कम सुना रहे हैं ।

अखबारों के मुखपृष्‍ठ
और
वेबसाइटों के होमपेज़
अपने एक कोने में
ऐसा ही कुछ दिखा रहे हैं ।

मैं हर ओर
एक नयापन खोज रहा हूँ,
पर कहीं भी
कुछ भी नया नहीं है
या फिर
सब कुछ नया ही नया है,
जो मुझको
पुराना लग रहा है ।

आज ठंड कुछ ज़्‍यादा ही है ।
मैं बिना नहाए ही
फिर से रजाई में घुस गया हूँ,
क्योंकि मुझे
नए वर्ष की नई सुबह से अच्‍छी
अपनी पुरानी रजाई लग रही है
और निश्‍चित रूप से
यही नई बात भी है ।

मैं बहुत ख्‍़ाश हुआ !
चलो, कुछ तो मिला -- ‘‘नया'' !
--
रावेंद्रकुमार रवि

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बनना ही पड़ेगा : नई कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, June 24, 2010

बनना ही पड़ेगा

करते ही एक क्लिक,
सुन लिए -
तुम्हारे मधुर बोल!
देख ली -
तुम्हारी मुस्कान की खिलन!
पढ़ लिए -
तुम्हारी आँखों के स्नेहिल भाव!
नहीं महसूस हो सकी -
तुम्हारी ऊष्मा!
मेरी सुगंध के लिए,
बनना ही पड़ेगा -
तुम्हें भ्रमर!


रावेंद्रकुमार रवि

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मज़दूर को देखिए : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, May 1, 2010

मज़दूर को देखिए -

बीड़ी के धुएँ में
साँसों को छौंककर
डेढ़ हड्डी पीठ पर
एक कुंतल गेहूँ लादे
रोटी के
दो क़तरों के लिए
अपनी साँझ देखती
ज़िंदगी को
लावा उगलती सड़कों पर
मृत कुत्ते की तरह
दिन-भर घसीटता है
और जब मिलते हैं
रोटी बनाने को
चार पैसे
तो दर्द से चीखती
पेशियों को
सुलाने के लिए
उन्हें दारू में घोलकर
आँतें सींच लेता है
ताकि कल फिर ... ... .
--
कविता : रावेंद्रकुमार रवि
----------------------------
चित्र : दिव्या शर्मा

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वसंत फिर आता है : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, February 14, 2010


वसंत आता है -
जब घर में जन्म लेती है बिटिया!

वसंत झिलमिलाता है -
जब उसके नयनों में सरसता है अपनापन!

वसंत मुस्कराता है -
जब मन पर सजते हैं उसकी मुस्कान के सुमन!

वसंत खिलखिलाता है -
जब सुवासित हवा को गुदगुदाते हैं उसके बोल!

वसंत गुनगुनाता है -
जब पुलकती है उसकी पैजनियों की झनक!

वसंत लजाता है -
जब उसके कपोलों पर खिलखिलाता है गुलमोहर!

वसंत महकता है -
जब उसके उर में विहँसता है गुलाब!

वसंत किलकता है -
जब उसके मन में जन्म लेता है आनंद!

वसंत अकुलाता है -
जब उसके हाथों पर रचता है अमलतास!

वसंत चला जाता है -
जब वह करती है सोलह सिंगार!

वसंत फिर आता है -
जब ... ... ... ..
रावेंद्रकुमार रवि

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