नन्हे दोस्तों को समर्पित मेरा ब्लॉग

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गरीब : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, June 29, 2011

गरीब
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‘‘भइ, ईमानदारी की भी हद हो गई !’’ - इंसपेक्टर साहब हैट उतारते हुए अपनी पत्नी से बोले
पत्नी ने उत्सुक होकर पूछा - ‘‘क्यों, क्या हुआ ?’’
‘‘आज एक ठेलेवाला आया था, थाने में ’’
‘‘तो ?’’
‘‘तो क्या, मूर्ख कहीं का ! पूरे दस हज़ार की गड्डी जमा कर गया ’’
‘‘अच्छा ’’
‘‘हाँ, और बोला कि पड़ी मिली है मालिक का पता चल जाता, तो उसे दे देता अपने पास रखूँगा, तो खर्च हो जाएँगे ’’ 
‘‘और आप इन्हें घर ले आए बहुत अच्छी बात है ! अब क्या इन्हें गरीबों में बँटवाने का इरादा है ?’’ - पत्नी ने उन पर व्यंग्य कसा
लेकिन वे उसकी बात का बुरा मानते हुए बोले - ‘‘तुम भी ... ... पूरी बुद्धू हो ... ... अरे, हम कौन से धन्ना सेठ हैं हम भी तो गरीब ही हैं जाओ, तिजोरी में सँभालकर रख दो काम आएँगे ’’ 
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रावेंद्रकुमार रवि 

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मंदिर की ख़ुशबू : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Monday, February 14, 2011

मंदिर की ख़ुशबू


घाटी में बसा हुआ गोपेश्वर पहाड़ियों के ऊपर बसे गाँवों से देखने पर बहुत सुंदर लगता है । घाटी के बीच में मोबाइल का टॉवर लगा हुआ है । टॉवर के पास भगवान शिव का मंदिर है । यहाँ के शिवजी गोपीनाथ के नाम से जाने जाते हैं । मंदिर काले पत्थरों से बना हुआ है । काले पत्थर धूप में चमचमा रहे हैं । गुनगुनी धूप बहुत अच्छी लग रही है । आसमान बिल्कुल साफ है । मंदिर के आँगन में महाशिवरात्रि का मेला लगा है । मेले का लाइव टेलीकास्ट चल रहा है । कुछ लोग घर में बैठे-बैठे टीवी पर मेला देख रहे हैं ।

चंदर भी टीवी देख रहा है । यह बात अलग है कि वह मेला कम देख रहा है और मेले में किसी को ढूँढ ज्यादा रहा है । दो घंटे बीत जाने के बाद भी जब उसे सुधा कहीं दिखाई नहीं दी, तो उसके सब्र का बाँध टूट गया । उसने अपने मोबाइल से सुधा का नंबर डायल किया - 9897614866 और कान से लगा लिया । एक ही डायल में फोन लग गया और उसे सुधा की हेलो ट्यून सुनाई देने लगी -


‘‘निगाहें निगाहों से मिलाकर तो देखो ... ...
नए लोगों से रिश्ता बनाकर तो देखो ... ...
जो है दिल में उसे कर दो बयाँ ... ...
ख़ुद को एक बार जताकर तो देखो ... ...
आसमाँ सिमट जाएगा तुम्हारे आगोश में ... ...
चाहत की बाहें फैलाकर तो देखो ... ...
दिल की बात बताकर तो देखो ... ... ’’

उधर सुधा के मोबाइल से भी इस गाने की रिंग-टोन बज उठी - ‘‘मेरे प्यार की आवाज पर चली आना ... ...’’
जैसे ही उसने यह एसाइन रिंग-टोन सुनी, वह समझ गई कि चंदर का फोन है । उसका मन भी गुनगुना उठा - ‘‘मैं आ रही हूँ प्यार की आवाज पर, ये प्यार-भरा नगमा तुम फिर से गुनगुनाना ... ... ’’


सुधा ने एक हाथ से बुरांश के लाल-गुलाबी फूलों से लदी टहनी पकड़ी । दूसरे हाथ में पकड़े मोबाइल को कान से लगाया और फोन रिसीव करते हुए बहुत मीठे-से पूछा - ‘‘क्या है ?’’

‘‘तृम मेला देखने क्यों नहीं आईं ?’’ - उधर से भी बहुत मीठी आवाज़ आई ।

फिर वे दोनों एक-दूसरे के कानों में रस घोलने लगे ।

‘‘तुम भी तो नहीं आए ?’’

‘‘तो क्या तुम मेले से बोल रही हो ?’’

‘‘नहीं, मैं तो टीवी में तुम्हें ढूँढ रही थी, पर तुम कहीं दिखाई ही नहीं दिए ।’’

‘‘धत्त तेरे की ! मैं भी तो तुम्हें टीवी में ढूँढ रहा था, पर तुम भी कहीं दिखाई नहीं दीं ।’’

‘‘मैंने सोचा, जब तुम दिखाई दोगे, तभी मैं भी आ जाऊँगी ।’’

‘‘मैंने भी तो यही सोचा ।’’

‘‘हो गए दोनों पागल !’’

‘‘अब क्या करें ?’’

‘‘सारा मेला तो टीवी पर ही देख लिया ... ... ’’

‘‘और अब तुम्हारी खिलखिलाहट भी सुन ली ... ... मिलने का क्या है ... ... अपना मेला तो कभी भी हो सकता है ... ... ’’

‘‘अरे, बुद्धू ! आज की बात ही कुछ और है । और फिर मंदिर की ख़ुशबू लेने के लिए तो मेले जाना ही पड़ेगा न ?’’

‘‘तो फिर देर किस बात की है ... ... आ जाओ जल्दी से ... ... थोड़ी-सी ख़ुशबू मुझे भी मिल जाएगी ... ... तुम्हारी ... ... मेरी साँसों को महकाने के लिए !’’

यह सुनते ही सुधा उड़ चली, मंदिर की ओर । किसी सुंदर-सी परी की तरह । पहाड़ी ढलान पर दौड़ते हुए ।

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रावेंद्रकुमार रवि
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वह मेरा दोस्त है : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, January 20, 2011

वह मेरा दोस्त है 
सुसुम के पापा उसके लिए चार पहियोंवाली साइकिल लाए । साइकिल कई रंगों से सजी थी । साइकिल के पिछले बड़े पहिए के साथ, दोनों ओर, दो छोटे पहिए और लगे थे । ये पहिए साइकिल को गिरने से बचाते थे । उसमें हैंडिल के बीच में आगे की तरफ एक सुंदर-सी डोलची लगी हुई थी । सुनहरे रंग की डोलची, जिसमें वह अपनी गुड़िया को बैठा सकती थी । 

साइकिल पर बैठकर सुसुम शाम को पार्क में घूम रही थी । वह अपनी गुड़िया से बातें भी करती जा रही थी - ‘‘अभी तुम छोटी हो । बड़ी हो जाओगी, तब मैं तुम्हें भी साइकिल चलाने के लिए दूँगी ।’’

अचानक उसे लगा कि कोई उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है । उसने मुड़कर देखा - ‘‘अरे, मानुर !’’ 
मानुर कहते ही उसकी साइकिल लड़खड़ाई और वह गिरने लगी । लेकिन गिरी नहीं । मानुर ने पीछे से साइकिल का कैरियर पकड़ लिया । गुड़िया भी गिरते-गिरते बची । सुसुम ने तुरंत उसे सँभाल लिया ।

‘‘मुझे भी दो न !’’ - मानुर ने इतने प्यार से कहा कि वह उसे मना नहीं कर पाई और फिर उसने उसे गिरने से भी तो बचाया था । 

‘‘अरे, क्या कर रहे हो ? धीरे चलाओ न !’’ - मानुर ने साइकिल पर बैठते ही उसे तेज़ भगाने की कोशिश की, तो सुसुम ने उसे रोका । 

‘‘अच्छा ठीक है ।’’ - मानुर ने न चाहते हुए भी तुरंत उसकी बात मान ली । नहीं तो, दुबारा कैसे मिलती साइकिल ?

सुसुम की माँ को पता चला, तो उन्होंने उसे डाँटा । उसकी समझ में नहीं आया - ‘क्यों डाँटा ?’

दूसरे दिन मानुर ने फिर से साइकिल माँगी, तो सुसुम ने कहा - ‘‘माँ डाँटती है । तुम अपने पापा से मँगा लो ।’’

मानुर ने बताया - ‘‘कहा तो था, पर नहीं लाते ।’’

यह सुनते ही सुसुम की नज़र मानुर की कमीज पर पड़ी । उसने हमेशा उसे वही कमीज पहने हुए देखा है । 

उसे ध्यान आया - ‘मानुर के सभी भाई-बहनों का भी यही हाल है ।’ 

वह मानुर के चेहरे पर एक नज़र डालते हुए आगे बढ़ गई और मानुर अपनी जगह पर खड़ा उसे देखता रह गया ।
सुसुम आगे तो बढ़ गई, पर उसका मन पीछे ही रहा । वह सोचती जा रही थी - ‘मानुर रोज़ एक ही शर्ट पहनता   है । उसके पापा साइकिल नहीं दिलाते । वह दूसरे स्कूल जाता है । पैदल-पैदल । मुझे लेने स्कूल की बस आती है ।’

फिर उसे याद आया - ‘टीवीवाले बताते हैं कि बच्चे कम होने चाहिए । पापा भी कहते हैं कि ज़्यादा बच्चों से ख़र्चा ज़्यादा होता है ।’

अब उसकी समझ में आया - ‘मानुर के मम्मी-पापा के पास ज़्यादा बच्चे हैं, इसलिए ख़र्चा ज़्यादा होता है । तभी उसके पापा साइकिल नहीं ला पाते ।’

घर में घुसने के बाद उसने साइकिल खड़ी की । गुड़िया को गोद में लिया और उससे बोली - ‘‘अब मैं माँ से कहूँगी - मुझे डाँटें नहीं । मैं मानुर को साइकिल दे दिया करूँगी । वह मेरा दोस्त है ।’’ 
-- रावेंद्रकुमार रवि --

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अहिंसक? : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, October 2, 2010

अहिंसक?

गांधी-जयंती के अवसर पर नेताजी भाषण दे रहे थे -

"हमें सदैव सत्यपथ का अनुसरण करना चाहिए। यदि हमको कोई कष्ट पहुँचाए, तो हमें उसके भले के लिए सोचना चाहिए। अपने धर्म के प्रति हमें कभी भी उदासीन नहीं होना चाहिए। हमें संसार के प्रत्येक जीव पर दया-दृष्टि रखनी चाहिए। सत्य, अहिंसा और धर्म का पालन करना हमारा परम कर्तव्य ... ... ...

वे भाषण दे ही रहे थे कि कहीं से एक मच्छर गुनगुनाता हुआ आया और उनका भाषण सुनकर इतना प्रसन्न तथा प्रभावित हुआ कि उसने नेताजी के गाल पर एक ज़ोरदार चुंबन जड़ दिया। सभी "चटाक्" की आवाज़ हुई और अगले ही पल वह नेताजी के हाथों यमलोक पहुँचा दिया गया।

किंचित व्यवधान के पश्चात नेताजी पुन: बोलने लगे -

"हाँ, तो मैं कह रहा था कि सत्य, अहिंसा ... ... ...

-- रावेंद्रकुमार रवि

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शेर और सियार : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, August 7, 2010

शेर और सियार

पास-पास के दो जंगलों में दो अलग-अलग शेरों का राज था।

एक जंगल के राजा ने सेवकों के रूप में कुछ सियार पाल रखे थे। सियारों का काम केवल इतना था कि वे राजा के आगे-पीछे चलते थे।

राजा शिकार करके पहले भोजन करता था और उसके बाद बचे हुए मांस को खाकर सियार अपना पेट भरते थे। इस प्रकार सियारों के दिन बहुत मज़े में कट रहे थे।

एक दिन राजा अस्वस्थ हो गया और उसने सियारों को ही शिकार करने का आदेश दे दिया। पहले तो सियारों को थोड़ी मु‍श्किल हुई, पर मिल-जुलकर उन्होंने एक शिकार कर ही डाला। शिकार करते ही उन्हें लगा कि वे भी राजा बन सकते हैं। यह विचार आते ही वे तुरंत उस शिकार को चट कर गए।

इसके बाद उन्होंने अस्वस्थ राजा को भी मारकर खा लिया और संयुक्त रूप से अपने आप को जंगल का राजा समझने लगे। जब पड़ोसी जंगल के राजा को यह समाचार मिला, तो उसने तुरंत उन सियारों का शिकार कर डाला और उस जंगल पर भी राज करने लगा।


रावेंद्रकुमार रवि

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भविष्य-दर्शन : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, July 8, 2010

भविष्य-दर्शन

मैं शिब्बू की दुकान पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था । वह मेरे लिए चाय बना रहा था । तभी एक झटके के साथ नए खुले मॉडर्न इंग्लिश स्कूल की वैन उसकी दुकान के सामने आकर रुकी और ड्राइविंग-सीट के पासवाली खिड़की से एक हाथ इस आवाज़ के साथ निकला - "शिब्बू भाई ! दो दिलबाग़ देना ज़रा ।

आज प्रंसिपल साहब ख़ुद ही ड्राइव कर रहे थे ।

शिब्बू ने दौड़कर उनको दिलबाग़ के दो गुटखे पकड़ा दिए । लौटते समय जब उसकी नज़र वैन में बैठे हुए उन नन्हे-मुन्ने मासूम बच्चों पर पड़ी, जो ललचाई नज़रों से उसकी दुकान में लटके दिलबाग़, यामू, प्रिंस, हरसिंगार आदि के रंग-बिरंगे गुटखों को देख रहे थे, तो उसकी आँखों में अपने आप ही एक विशेष प्रकार की चमक आ गई ।


रावेंद्रकुमार रवि

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हमें नहीं पसंद है : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, June 17, 2010

लघुकथा -

हमें नहीं पसंद है


‘‘भइ, हमें आपकी बेटी पसंद है । आप अपनी बेटी से पूछ लीजिए कि उसे भी हमारा बेटा पसंद है या नहीं !''

लड़के के पिता ने जब यह कहा, तो ‘उनकी' बेटी ने लजाकर नजरें झुका लीं ।

यह देखकर लड़के की माँ बोलीं - ‘‘ठीक है ! अब हम सगाई की रस्‍म पूरी करके ही जाएँगे । अगले महीने की कोई तारीख्‍़ा शादी के लिए भी निश्‍चित कर लेंगे ... ... ... बेटी ! अपना हाथ आगे बढ़ाओ ... ... ... लो बेटा ! यह अँगूठी बहू की उँगली में पहना दो ... ... ... ''

‘‘लेकिन ... ... ... '' - उन्‍होंने तुरंत उनको रोक दिया ।

‘‘अरे भइ, पहनाने दीजिए !'' - लड़के के पिता ने अनुरोध किया ।

लेकिन वे बोले - ‘‘देखिए भाई साहब ! हमारी एक ही लड़की है । पहले सारी बातें तो तय कर लीजिए । बाद में सगाई भी हो जाएगी और शादी भी ।''

‘‘क्‍या मतलब ?''

‘‘यही कि आप लोगों की माँग क्‍या है ? वह भी पहले ही बता दें, तो ज़्यादा अच्‍छा रहेगा ।''

यह सुनकर लड़के के पिता हँसने लगे । बोले - ‘‘भगवान का दिया सब कुछ है हमारे पास । हमें तो बस आपकी बेटी चाहिए । हमारी कोई माँग नहीं है और न ही हम कुछ लेंगे ... ... ... बेटा ! तुम अँगूठी पहनाओ ।''

‘‘लेकिन फिर भी, हमें कुछ सोचने का मौका तो दीजिए ।'' - यह कहकर उन्‍होंने लड़के को फिर रोक दिया ।

‘‘ठीक है भइ, सोच-समझकर ही बताइएगा ।'' - बाहर की ओर साँस छोड़ते हुए लड़के के पिता ने अपनी पत्‍नी और बेटे की ओर चलने का इशारा किया ।

लड़की ने बड़ी हसरत-भरी निगाहों से उन्‍हें जाते हुए देखा ।

उनके जाने के बाद वे अपनी पत्‍नी से बोले - ‘‘बिना दहेज दिए बेटी की शादी करके बिरादरी में नाक नहीं कटानी हमें ! डाल देना एक पोस्‍टकार्ड और लिख देना - हमें नहीं पसंद है, उनका बेटा !''

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रावेंद्रकुमार रवि


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