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कविता : इसीलिए तुम भी उदास हो : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, November 3, 2013

इसीलिए तुम भी उदास हो

रावेंद्रकुमार रवि


पहले तुम जब भी आती थीं,
ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ लाती थीं!
पहले तुम जब भी जाती थीं,
ख़ुशियाँ ही देकर जाती थीं!

लेकिन अब तुम जब आती हो,
ख़ुशियाँ कहीं छुपा आती हो!
लेकिन अब तुम जब जाती हो,
ख़ुशियाँ कहीं छुपा जाती हो!

मैं चाहूँ तुम जब भी आओ,
ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ ले आओ!
मैं चाहूँ तुम जब भी जाओ,
ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ दे जाओ!

लेकिन तुमने ख़ुशियोंवाली,
बात नहीं करने की ठानी!
मेरे मन की बात सुनी ना,
बस अपने ही मन की मानी!

आज तुम्हारे मैं न पास हूँ,
तुम भी मेरे नहीं पास हो!
इसीलिए मैं भी उदास हूँ,
इसीलिए तुम भी उदास हो!


रावेंद्रकुमार रवि

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मंदिर है मन : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, January 14, 2012


मंदिर है मन 


सोलह शृंगार तुम्हारे 
महकता सुमन! 
तभी तो अभी तक - 
मंदिर है मन!


रावेंद्रकुमार रवि

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जब भी मन करता है : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Monday, December 5, 2011


जब भी मन करता है
तुम मुझे
अपनी तरफ देखता देखकर
अक्सर अपना मुँह
घुमा लेती हो!

क्या तुम जानती हो
कि मैं भी
चाहता हूँ
कि तुम ऐसा ही करो!

और चाहता हूँ
कि तुम यह कभी न जान पाओ
कि तुम मुझे साइड से
ज़्यादा सुंदर लगती हो!

क्योंकि मेरा दिल
तुम्हारे ख़ूबसूरत कान में सजे
झुमके में बैठकर
झूला झूलने लगता है!

और जब भी
मन करता है
प्यार से महकते हुए
तुम्हारे गालों को चूम लेता है! 

रावेंद्रकुमार रवि

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नियति : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Monday, July 11, 2011

नियति
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चार आँखें दो हुईं,
क्या हो गया!
स्वप्न की अनुगूँज का
आभास तक बिसरा गया!

करती रही मनुहार पायल,
भीजती देहरी रही!
बढ़ते रहे दो पाँव लेकिन,
दृष्टि लादे पीठ पर!

राह पर जीवन की तो
बढ़ना ही होगा,
पीठ पर हो दृष्टि
या हृदय हाथ पर!

रावेंद्रकुमार रवि

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सजाकर मुस्कान में : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, June 22, 2011

सजाकर मुस्कान में





हो गईं सुवासित
सब हृदय की वीथिकाएँ,
जब किया
तुमने पदार्पण
सजाकर मुस्कान में
निश्छल प्रणय की
भावनाओं को!

रावेंद्रकुमार रवि

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मत दिखाओ : रावेंद्रकुमार रवि

>> Monday, June 6, 2011


मत दिखाओ

मैं नहीं हूँ 
प्यास का मारा 
हुआ मृग, 

जो भटकता 
फिर रहा 
मरुभूमि में हो! 

मत दिखाओ 
तुम मुझे 
मारीचिकाएँ प्यार की! 

रावेंद्रकुमार रवि

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दिल ही दिल में : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, April 22, 2011

दिल ही दिल में
हम
दिल से भी
कुछ कहते हैं,

तुम
उसको दिल से
सुन लेना!

सच में
यदि आ न सको,
मत आना!

दिल ही
दिल में
मिल लेना!
--
रावेंद्रकुमार रवि

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दो दीप जलें : कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, November 3, 2010

दो दीप जलें


प्रिय,
आओ,
दीप जलाएँ!

तुम
एक दीप
ऐसे पकड़ो,

मैं
एक दीप
ऐसे पकड़ूँ!

दोनों
की बाती
एक करो,

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

रावेंद्रकुमार रवि

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लिखना, कैसी हो तुम? : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, October 10, 2010

लिखना, कैसी हो तुम?




आशा है यह पत्र पहुँच जाएगा
तुम तक और तुम्हारे मन भाएगा,
पढ़कर इसको ख़ुश होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

धान के खेत और उनमें लगी बालियाँ
यानि कि वसुधा की धानी चूनर में फूल,
अब मुस्कराने लगे होंगे ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

धान की बालियों से उठती सुगंध
आकर तुम्हारे पास, चुपके से कुछ
कह जाती तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

गुनगुनाने लगी होगी अब वहाँ की
धूप भी, शीत की अठखेलियों के साथ,
तुम्हें भाती तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

पास बैठकर खिड़की के
चुपचाप गाँव की पगडंडी को
रोज़ देखती तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

पथ निहारने का कारण क्या?
कोई आ जाएगा क्षण में,
यही प्रतीक्षा तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

किसी के लिए, हाथ हिलाकर
दूर जा रहे बदली-दल को
संदेश तो कुछ देती होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?



रावेंद्रकुमार रवि

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मैं + तुम = एक : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, September 5, 2010

मैं + तुम = एक


अब तक
कठिन से कठिन
भौतिकी के सैकड़ों सूत्र
चुटकी बजाते
हल कर चुका हूँ!

गणित के
समीकरण भी
सिद्ध करने में
कभी नहीं चूका!

किंतु फिर भी
एक समीकरण
अभी तक
सिद्ध नहीं कर पाया,

जो कभी
दिया था तुमने -
"मैं + तुम = एक"

रावेंद्रकुमार रवि

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जो तुम्हारे पास है : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, August 29, 2010

जो तुम्हारे पास है


तुम मुझे आज तक
शुभकामनाएँ देती रही हो -
ईश्वर तुम्हें जीवन की हर ख़ुशी दे!

यदि चाहती हो तुम
सचमुच ऐसा,
तो मेरे जीवन की
वह ख़ुशी,
जिसको पाए बिना
मैं कभी
पूरी तरह से
ख़ुश नहीं हो सकता,
मुझे क्यों नहीं दे देतीं?

वह तो तुम्हारे पास ही है,
ईश्वर के पास नहीं!

रावेंद्रकुमार रवि

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जहाँ तुम होओगी : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, August 22, 2010

बादलों के रूप में




तुम,
मुझसे
चाहे कितनी भी दूर
चली जाओ,

किंतु
मेरे आँसू
तुम्हारा पीछा
कभी नहीं छोड़ेंगे!

गालों पर
लुढ़कने से पहले ही
वाष्प बनकर
उड़ जाएँगे

और
बादलों के रूप में
संघनित
होने के बाद

एक-दूजे से
टकराकर
वहीं बरस पड़ेंगे,
जहाँ तुम होओगी!

रावेंद्रकुमार रवि

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तुम्हारी याद आती है : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, August 15, 2010

तुम्हारी याद आती है




अनुपम नूपुर धुन सुनकर
स्वप्निल निंदिया
जब दूर कहीं
उड़ जाती है,
तुम्हारी याद आती है!

क्षणदा में व्याकुल मालती
बैठकर कनेर पर
जब बिरह का
गीत गाती है,
तुम्हारी याद आती है!

भोर के सुहाने क्षणों में
अहले-गहले अल्हड़ पवन
जब जगाने को मुझे
चादर उड़ाती है,
तुम्हारी याद आती है!

बरसाती पानी में
छप-छप करती
चंचल गौरइया
जब नहाती है,
तुम्हारी याद आती है!

नीम की फुनगी पर
अभिगुंजन करती बुलबुल
कोई निबोली अधपकी
जब गिराती है,
तुम्हारी याद आती है!


रावेंद्रकुमार रवि

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सरस झोंका : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, July 22, 2010

सरस झोंका

अंबर में डोल रहा
बादल आवारा!
वसुधा को छेड़ रहा
मारकर फुहारा!

मधुमुखियाँ कहती हैं
फूल हमें भाए!
भौंरों ने कलियों के
घूँघट सरकाए!

नेह-भरी अँखियों में
ख़ुद को जब देखा!
साजन ने हाथ पकड़
सजनी को रोका!

गालों पर सजने का
आज मिला मौका!
अलकों को छेड़ गया
एक सरस झोंका!


रावेंद्रकुमार रवि

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तुम्हीं बता दो ... ... . : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, July 15, 2010

तुम्हीं बता दो ... ...


मेरी आँखों को भाती है - 
मधु-मुस्कान तुम्हारी 
और दमकती छवि तुम्हारी -
चंदा-जैसी!

मेरे कानों में अमृत घोले -
आवाज़ तुम्हारी
और सरसती हँसी तुम्हारी -
झरने-जैसी!

मेरी साँसों को महकाता -
अधर-पराग तुम्हारा
और सुगंधित अलक तुम्हारी -
हरसिँगार-जैसी!

मेरे मन को पुलकित करता -
प्रिय अनुराग तुम्हारा
और नेह से भीगी बतियाँ
मिसरी-जैसी!

कैसे ना बन जाऊँ फिर
मैं रसिक तुम्हारा?
तुम्हीं बता दो -
तुम मुझको क्यों
इतनी अच्छी लगती हो? 

रावेंद्रकुमार रवि

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अनुपम उपहार : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, April 23, 2010

अनुपम उपहार










प्रत्येक
दृष्टि
-मिलन पर
तुम्हारे
द्वारा
दिया
गया
निश्छल
मुस्कान का
अनुपम
उपहार

मेरे
हृदयाकाश में
वैसे
ही
सजा
हुआ है,
जैसे
-
भोर
के
आँचल
में सजी
रवि
की
नव
रश्मियाँ!

रावेंद्रकुमार रवि

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अनुरोध : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, April 14, 2010

अनुरोध










मेरा

हृदय-सुमन
पलकों में
सजा
सुमन
बन जाओ!

और

सुमन में
मेरे मन के
सुर का
गीत
सजाओ!

सुमन
मैं भी बन जाऊँगा,
तुम्हारा मीत कहाऊँगा!


रावेंद्रकुमार रवि

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कैसे भूल जाऊँ? : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, April 8, 2010

कैसे भूल जाऊँ?












नहीं भूल सकता -
केश-परिमल के
नीहार में
भ्रमर-सा
खो जाना!
झुकी पलकों की
छाँव में
पथिक-सा
सो जाना!

नहीं भूल पाता -
रूप-जलधि की
लहरों में
प्रणय-बिंबों-सा
रच जाना!
उड़ते आँचल की
गोदी में
मस्त पवन-सा
बस जाना!

कैसे भूल जाऊँ?
मन की
काव्य-पंक्तियों में
कवि-सा
रम जाना!
बदली-सी
अलकावलि में
रवि-सा
सज जाना!


रावेंद्रकुमार रवि

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तुमसे बिछुड़कर : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, April 1, 2010


तुमसे बिछुड़कर











कहते हैं


विश्व की समस्त ऊर्जा


संरक्षित है!



लेकिन


तुमसे बिछुड़कर


मुझे ऐसा लगा -



जैसे वो


मेरी


बोझिल पलकों में


समाने के बाद



आँखों से


आँसू के रूप में


शून्य बनकर


टपक पड़ी


और


नष्ट हो गई है!



रावेंद्रकुमार रवि

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सुमधुर आवाज़ : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, March 26, 2010

सुमधुर आवाज़











जब भी
आती
है याद
वह सिंदूरी शाम,
जब देखा था मैंने
तुम्हें पहली-पहली बार,

अनुगुंजित

होती
है
अंतस के कोनों में
यह सुमधुर आवाज़ --
"
प्रिया, ख़त लिखूँ तुम्हें!"


रावेंद्रकुमार रवि

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