नन्हे दोस्तों को समर्पित मेरा ब्लॉग

मुझको बता दो : रावेंद्रकुमार रवि

>> Tuesday, February 2, 2010

मुझको बता दो
मैं तुम्हारी
हृदय-वीणा की
मधुर झंकार
सुनना चाहता हूँ!

हैं अगर
उसमें बसे
सुर प्यार के
मेरे लिए,
मुझको बता दो!

चला आऊँगा
सजाने,
मैं उन्हें
अपने हृदय के
गीत की
सबसे मधुरतम्
तान से!
--
रावेंद्रकुमार रवि

23 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक February 2, 2010 at 7:47 PM  

प्रियवर रावेंद्रकुमार रवि जी!
मन से बनाये गये नव्य-ब्लॉग
"रवि मन" का मन से स्वागत करता हूँ!

ज्योति सिंह February 2, 2010 at 9:31 PM  

सजाने,
मैं उन्हें
अपने हृदय के
गीत की
सबसे मधुरतम्
तान से!अति सुन्दर मन भावन ब्लॉग ,ढेरो बधाईयाँ आपको

Udan Tashtari February 2, 2010 at 11:50 PM  

स्वागत है आपके इस ब्लॉग का.

निर्मला कपिला February 3, 2010 at 9:20 AM  

बहुत सुन्दर है ब्लाग और पहली रचना तो कमाल है
मैं तुम्हारी
हृदय-वीणा की
मधुर झंकार
सुनना चाहता हूँ!
बहुत बहुत शुभकामनायें

RAJNISH PARIHAR February 3, 2010 at 8:57 PM  

स्वागत है आपके इस ब्लॉग का...WELCOME

अशोक कुमार पाण्डेय February 3, 2010 at 9:06 PM  

सुन्दर…अति सुन्दर!!

shama February 3, 2010 at 9:19 PM  

चला आऊँगा
सजाने,
मैं उन्हें
अपने हृदय के
गीत की
सबसे मधुरतम्
तान से!
Bahut sundar! Aur utnahi sundar chitr bhi!

kshama February 3, 2010 at 9:47 PM  

मैं तुम्हारी
हृदय-वीणा की
मधुर झंकार
सुनना चाहता हूँ!

Bahut sundar!
Tahe dilse swagat hai!

चंदन कुमार झा February 3, 2010 at 11:19 PM  

सुन्दर रचना॥

शुभकामनायें ।

अजय कुमार February 4, 2010 at 10:36 AM  

हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

शशांक शुक्ला February 4, 2010 at 1:17 PM  

आपके मनोभाव को समझ रहे है रवि जी बेहतरीन

सुभाष नीरव February 6, 2010 at 9:47 AM  

सुन्दर है भाई रवि ! मेरी शुभकामनाएं !

सुलभ § सतरंगी February 6, 2010 at 9:57 AM  

सुन्दर ब्लॉग और मनभावन रचना !

रंजन February 6, 2010 at 11:41 AM  

बहुत सुन्दर.. ब्लॉग.. सुन्दर रचना..

वन्दना अवस्थी दुबे February 6, 2010 at 12:45 PM  

बहुत बहुत स्वागत है. गीत तो बहुत सुन्दर है ही.

Prem Farrukhabadi February 6, 2010 at 3:05 PM  

मैं तुम्हारी
हृदय-वीणा की
मधुर झंकार
सुनना चाहता हूँ!

सुन्दर…अति सुन्दर!!!

sangeeta swarup February 7, 2010 at 2:56 PM  

मन की मधुर तान से शुरू किया है आपने ये ब्लॉग....बहुत खूब और बधाई

संजय भास्कर February 8, 2010 at 5:48 PM  

सुन्दर…अति सुन्दर!!

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } February 9, 2010 at 7:59 PM  

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,
धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,
कलम के पुजारी अगर सो गये तो
ये धन के पुजारी
वतन बेंच देगें।



हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में प्रोफेशन से मिशन की ओर बढ़ता "जनोक्ति परिवार "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ ,

sidheshwer February 10, 2010 at 7:04 AM  

बधाई !
नए ब्लाग की !
जय हो !

संपादक : बालप्रहरी February 13, 2010 at 7:43 PM  

आपकी कविता बहुत अच्छी लगी । इस ब्लॉग के माध्यम से आपकी रचनाएँ पढ़ने को मिलती रहेंगी । आपको बहुत-बहुत बधाई।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ February 17, 2010 at 1:29 AM  

दोनों कविताएं खूबसूरत हैं ,क्योंकि इनमें सहजता सरसता और अनुभूतियों की आवरणरहित अभिव्यक्ति है ।

सत्य नारायण सत्य February 21, 2010 at 6:20 PM  

बहुत मधुर है।

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