नन्हे दोस्तों को समर्पित मेरा ब्लॉग

नए वर्ष की नई सुबह : नई कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, December 26, 2010

नए वर्ष की नई सुबह : कुछ झलकियाँ


कल भी मैं
सुबह पाँच बजे उठकर
पढ़ने का संकल्‍प लेकर
सोया था,
पर आज उठा वही आठ बजे ।

रोज़ की तरह -
रजाई के अंदर पड़ा-पड़ा
घड़ी का अलार्म सुनता रहा ।

नए वर्ष की नई सुबह देखने
छत पर गया, तो देखा -
पिछले कई दिनों की तरह
आज भी सूरज
कोहरे की चादर के पीछे खड़ा
टिमटिमा रहा है ।

रोज़ की तरह -
सड़क के किनारे
बत्‍तख्‍ों और मुर्गियाँ
गंदी नालियों में से
अपने लिए
सुलभ आहार खोज रहे हैं ।

चाय की दुकान पर बैठे
कुछ लोग
अखबार में घुसकर
चाय पी रहे हैं
और कुछ लोग
दुकान के आगे जल रही
धान की भूसी ताप रहे हैं ।

रोज़ की तरह -
छोटा भाई कह रहा है -
मैं आज नहीं
कल स्‍कूल जाऊँगा
और मम्‍मी
उसे ज़बरदस्‍ती तैयार कर रही हैं ।

टीवी, रेडियो, अखबार
और वेबसाइटों पर भी
कुछ नया नहीं है ।
रेडियो-टीवी के उद्‌घोषक
उसी पुराने अंदाज़ में
‘हैप्‍पी न्‍यू इयर' ज़्‍यादा
और ‘नव वर्ष मंगलमय हो'
कम सुना रहे हैं ।

अखबारों के मुखपृष्‍ठ
और
वेबसाइटों के होमपेज़
अपने एक कोने में
ऐसा ही कुछ दिखा रहे हैं ।

मैं हर ओर
एक नयापन खोज रहा हूँ,
पर कहीं भी
कुछ भी नया नहीं है
या फिर
सब कुछ नया ही नया है,
जो मुझको
पुराना लग रहा है ।

आज ठंड कुछ ज़्‍यादा ही है ।
मैं बिना नहाए ही
फिर से रजाई में घुस गया हूँ,
क्योंकि मुझे
नए वर्ष की नई सुबह से अच्‍छी
अपनी पुरानी रजाई लग रही है
और निश्‍चित रूप से
यही नई बात भी है ।

मैं बहुत ख्‍़ाश हुआ !
चलो, कुछ तो मिला -- ‘‘नया'' !
--
रावेंद्रकुमार रवि

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मेरा दर्शन, रूप तुम्हारा : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, November 18, 2010

मेरा दर्शन, रूप तुम्हारा

मेरे मन-महेश की पारो
बनी तुम्हारी मधु-मुस्कान!
मेरा ध्यान लक्ष्य करके जो
करती चाहत का संधान!

जब-जब मुग्ध तुम्हारी छवियों
की बातें सुधियाँ करतीं!
हृदय-वेणु की मुदित तरंगें
झंकृतियों से सज उठतीं!
मेरा दर्शन, रूप तुम्हारा
बने सुवासित मीत समान!
मेरे मन...

तरुण विहग की बोली-जैसी
लगे तुम्हारी मीठी बात!
जिसको सुनकर रोम-रोम में
खिलता मधुरिम सुखद प्रभात!
मेरे प्रणय-कैमरे की तुम
बनीं प्रीति-पायस-प्रतिमान !
मेरे मन...

रावेंद्रकुमार रवि

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दो दीप जलें : कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, November 3, 2010

दो दीप जलें


प्रिय,
आओ,
दीप जलाएँ!

तुम
एक दीप
ऐसे पकड़ो,

मैं
एक दीप
ऐसे पकड़ूँ!

दोनों
की बाती
एक करो,

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

दो
दीप जलें
एक जोत जगे ... ... .

रावेंद्रकुमार रवि

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ऐसे करवाचौथ मनाओ : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Tuesday, October 26, 2010

ऐसे करवाचौथ मनाओ! 


ख़ुशियों का मधुमास बुलाओ,
ऐसे करवाचौथ मनाओ!

मन से मन तक डोर
प्रणय की बाँधो मन से,
उसे भिगोकर अपने
प्रियतम् के सुमिरन से,

सुधियों से परिहास सजाओ,
ऐसे करवाचौथ मनाओ!

यौवन तक खिल-खिलकर
जो आया बचपन से,
पुलिकत झलक-झलककर
जो सुखमय जीवन से,

वह निश्छल विश्वास जगाओ,
ऐसे करवाचौथ मनाओ!

रावेंद्रकुमार रवि

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क्वाँर की इस साँझ : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, October 17, 2010

क्वाँर की इस साँझ




ले रही है नाम
नूपुर-झाँझ
प्रीतम-मीत का!
गा रही है गीत
अब गोधूलि
सोनल प्रीत का!

क्वाँर की इस साँझ
साजन ने
न जाने कह दिया क्या
मधुर उसके कान में!

फिर रही सजनी पुलक
घर-आँगने
मोहिनी मुस्कान मन-भर
सज नए परिधान में!

छुअन को महका रहा है
सरस झोंका प्यार-सा
मधु-सीत का!
चल पड़ा है सिलसिला अब
हर नवेली रात में
नव-रीत का!


रावेंद्रकुमार रवि

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लिखना, कैसी हो तुम? : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, October 10, 2010

लिखना, कैसी हो तुम?




आशा है यह पत्र पहुँच जाएगा
तुम तक और तुम्हारे मन भाएगा,
पढ़कर इसको ख़ुश होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

धान के खेत और उनमें लगी बालियाँ
यानि कि वसुधा की धानी चूनर में फूल,
अब मुस्कराने लगे होंगे ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

धान की बालियों से उठती सुगंध
आकर तुम्हारे पास, चुपके से कुछ
कह जाती तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

गुनगुनाने लगी होगी अब वहाँ की
धूप भी, शीत की अठखेलियों के साथ,
तुम्हें भाती तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

पास बैठकर खिड़की के
चुपचाप गाँव की पगडंडी को
रोज़ देखती तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

पथ निहारने का कारण क्या?
कोई आ जाएगा क्षण में,
यही प्रतीक्षा तो होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?

किसी के लिए, हाथ हिलाकर
दूर जा रहे बदली-दल को
संदेश तो कुछ देती होगी ना?
लिखना -
कैसी हो तुम?
अच्छी तो हो ना?



रावेंद्रकुमार रवि

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अहिंसक? : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, October 2, 2010

अहिंसक?

गांधी-जयंती के अवसर पर नेताजी भाषण दे रहे थे -

"हमें सदैव सत्यपथ का अनुसरण करना चाहिए। यदि हमको कोई कष्ट पहुँचाए, तो हमें उसके भले के लिए सोचना चाहिए। अपने धर्म के प्रति हमें कभी भी उदासीन नहीं होना चाहिए। हमें संसार के प्रत्येक जीव पर दया-दृष्टि रखनी चाहिए। सत्य, अहिंसा और धर्म का पालन करना हमारा परम कर्तव्य ... ... ...

वे भाषण दे ही रहे थे कि कहीं से एक मच्छर गुनगुनाता हुआ आया और उनका भाषण सुनकर इतना प्रसन्न तथा प्रभावित हुआ कि उसने नेताजी के गाल पर एक ज़ोरदार चुंबन जड़ दिया। सभी "चटाक्" की आवाज़ हुई और अगले ही पल वह नेताजी के हाथों यमलोक पहुँचा दिया गया।

किंचित व्यवधान के पश्चात नेताजी पुन: बोलने लगे -

"हाँ, तो मैं कह रहा था कि सत्य, अहिंसा ... ... ...

-- रावेंद्रकुमार रवि

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क्वाँर की दहलीज पर : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, September 24, 2010

क्वाँर की दहलीज पर


गुनगुनी होने लगी है
दपदपाती धूप अब तो
क्वाँर की दहलीज पर धर पाँव!

नवविवाहित युगल-जैसी
मुदित है हर भोर अब तो
हो रहा मधुमास पूरा गाँव!

है बुलाती पास अपने
सरसती वातासि अब तो
धानवाले खेत नंगे पाँव!

सोच परदेसी पिया का
गाल पर धर हाथ अब तो
करे सजनी बैठ पीपल छाँव!

झूठ-से लगते उसे हैं
सगुन के सब काज अब तो
झूठ-सी ही भोर की अब काँव!


रावेंद्रकुमार रवि

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चूड़ियाँ ये आपकी : ग़ज़ल : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, September 17, 2010

चूड़ियाँ ये आपकी


चूमकर गोरी कलाई, ढीठ बनकर आपकी!
मुँह चिढ़ाती हैं हमें, चूड़ियाँ ये आपकी!

रंग इन पर तब सजा, केतकी के फूल-सा!
जब रिझाती हैं हमें, चूड़ियाँ ये आपकी!

छोड़कर सब काम आना, रोज़ पड़ता है हमें!
जब बुलाती हैं हमें, चूड़ियाँ ये आपकी!

अगर चाहा रूठना, आपसे हमने ज़रा भी!
मना लेती हैं हमें, चूड़ियाँ ये आपकी!

प्रीत के मधु पलों में, गीत पावन मिलन के!
सुना देती हैं हमें, चूड़ियाँ ये आपकी!

रूप धर जब किरण-सा, बात रवि की मानतीं!
ख़ूब भाती हैं हमें, चूड़ियाँ ये आपकी!

रावेंद्रकुमार रवि

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मैं + तुम = एक : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, September 5, 2010

मैं + तुम = एक


अब तक
कठिन से कठिन
भौतिकी के सैकड़ों सूत्र
चुटकी बजाते
हल कर चुका हूँ!

गणित के
समीकरण भी
सिद्ध करने में
कभी नहीं चूका!

किंतु फिर भी
एक समीकरण
अभी तक
सिद्ध नहीं कर पाया,

जो कभी
दिया था तुमने -
"मैं + तुम = एक"

रावेंद्रकुमार रवि

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जो तुम्हारे पास है : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, August 29, 2010

जो तुम्हारे पास है


तुम मुझे आज तक
शुभकामनाएँ देती रही हो -
ईश्वर तुम्हें जीवन की हर ख़ुशी दे!

यदि चाहती हो तुम
सचमुच ऐसा,
तो मेरे जीवन की
वह ख़ुशी,
जिसको पाए बिना
मैं कभी
पूरी तरह से
ख़ुश नहीं हो सकता,
मुझे क्यों नहीं दे देतीं?

वह तो तुम्हारे पास ही है,
ईश्वर के पास नहीं!

रावेंद्रकुमार रवि

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जहाँ तुम होओगी : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, August 22, 2010

बादलों के रूप में




तुम,
मुझसे
चाहे कितनी भी दूर
चली जाओ,

किंतु
मेरे आँसू
तुम्हारा पीछा
कभी नहीं छोड़ेंगे!

गालों पर
लुढ़कने से पहले ही
वाष्प बनकर
उड़ जाएँगे

और
बादलों के रूप में
संघनित
होने के बाद

एक-दूजे से
टकराकर
वहीं बरस पड़ेंगे,
जहाँ तुम होओगी!

रावेंद्रकुमार रवि

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तुम्हारी याद आती है : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, August 15, 2010

तुम्हारी याद आती है




अनुपम नूपुर धुन सुनकर
स्वप्निल निंदिया
जब दूर कहीं
उड़ जाती है,
तुम्हारी याद आती है!

क्षणदा में व्याकुल मालती
बैठकर कनेर पर
जब बिरह का
गीत गाती है,
तुम्हारी याद आती है!

भोर के सुहाने क्षणों में
अहले-गहले अल्हड़ पवन
जब जगाने को मुझे
चादर उड़ाती है,
तुम्हारी याद आती है!

बरसाती पानी में
छप-छप करती
चंचल गौरइया
जब नहाती है,
तुम्हारी याद आती है!

नीम की फुनगी पर
अभिगुंजन करती बुलबुल
कोई निबोली अधपकी
जब गिराती है,
तुम्हारी याद आती है!


रावेंद्रकुमार रवि

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शेर और सियार : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, August 7, 2010

शेर और सियार

पास-पास के दो जंगलों में दो अलग-अलग शेरों का राज था।

एक जंगल के राजा ने सेवकों के रूप में कुछ सियार पाल रखे थे। सियारों का काम केवल इतना था कि वे राजा के आगे-पीछे चलते थे।

राजा शिकार करके पहले भोजन करता था और उसके बाद बचे हुए मांस को खाकर सियार अपना पेट भरते थे। इस प्रकार सियारों के दिन बहुत मज़े में कट रहे थे।

एक दिन राजा अस्वस्थ हो गया और उसने सियारों को ही शिकार करने का आदेश दे दिया। पहले तो सियारों को थोड़ी मु‍श्किल हुई, पर मिल-जुलकर उन्होंने एक शिकार कर ही डाला। शिकार करते ही उन्हें लगा कि वे भी राजा बन सकते हैं। यह विचार आते ही वे तुरंत उस शिकार को चट कर गए।

इसके बाद उन्होंने अस्वस्थ राजा को भी मारकर खा लिया और संयुक्त रूप से अपने आप को जंगल का राजा समझने लगे। जब पड़ोसी जंगल के राजा को यह समाचार मिला, तो उसने तुरंत उन सियारों का शिकार कर डाला और उस जंगल पर भी राज करने लगा।


रावेंद्रकुमार रवि

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नाम तुम्हारा : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, July 30, 2010

नाम तुम्हारा




मेरे नवगीतों में नाम
तुम्हारा ऐसे सजता है -
जैसे रातों की रानी
पूनम में इंदु विहँसता है!


इंदु-प्रभा की किरण-किरण में
सजे तुम्हारे नेह-सुमन!
इन सुमनों की मुस्कानों से
सुख पाती मेरी धड़कन!

मेरे नवगीतों में नाम
तुम्हारा ऐसे सजता है -
जैसे मेरी हर धड़कन में
रूप तुम्हारा बसता है!


मेरा हृदय-निलय अनुगुंजित
रहे तुम्हारी बातों से!
ऐसी प्रीति करो अनुबंधित
अमिट-अभंजित नातों से!

मेरे नवगीतों में नाम
तुम्हारा ऐसे सजता है -
जैसे संबंधों का यौवन
संघर्षों से तपता है!

रावेंद्रकुमार रवि

(फ़ोटो : Saguaro Moon : नासा से साभार :
Astronomy Picture of the Day : 2007 September 26 :
Credit & Copyright: Stefan Seip)

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सरस झोंका : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, July 22, 2010

सरस झोंका

अंबर में डोल रहा
बादल आवारा!
वसुधा को छेड़ रहा
मारकर फुहारा!

मधुमुखियाँ कहती हैं
फूल हमें भाए!
भौंरों ने कलियों के
घूँघट सरकाए!

नेह-भरी अँखियों में
ख़ुद को जब देखा!
साजन ने हाथ पकड़
सजनी को रोका!

गालों पर सजने का
आज मिला मौका!
अलकों को छेड़ गया
एक सरस झोंका!


रावेंद्रकुमार रवि

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तुम्हीं बता दो ... ... . : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, July 15, 2010

तुम्हीं बता दो ... ...


मेरी आँखों को भाती है - 
मधु-मुस्कान तुम्हारी 
और दमकती छवि तुम्हारी -
चंदा-जैसी!

मेरे कानों में अमृत घोले -
आवाज़ तुम्हारी
और सरसती हँसी तुम्हारी -
झरने-जैसी!

मेरी साँसों को महकाता -
अधर-पराग तुम्हारा
और सुगंधित अलक तुम्हारी -
हरसिँगार-जैसी!

मेरे मन को पुलकित करता -
प्रिय अनुराग तुम्हारा
और नेह से भीगी बतियाँ
मिसरी-जैसी!

कैसे ना बन जाऊँ फिर
मैं रसिक तुम्हारा?
तुम्हीं बता दो -
तुम मुझको क्यों
इतनी अच्छी लगती हो? 

रावेंद्रकुमार रवि

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भविष्य-दर्शन : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, July 8, 2010

भविष्य-दर्शन

मैं शिब्बू की दुकान पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था । वह मेरे लिए चाय बना रहा था । तभी एक झटके के साथ नए खुले मॉडर्न इंग्लिश स्कूल की वैन उसकी दुकान के सामने आकर रुकी और ड्राइविंग-सीट के पासवाली खिड़की से एक हाथ इस आवाज़ के साथ निकला - "शिब्बू भाई ! दो दिलबाग़ देना ज़रा ।

आज प्रंसिपल साहब ख़ुद ही ड्राइव कर रहे थे ।

शिब्बू ने दौड़कर उनको दिलबाग़ के दो गुटखे पकड़ा दिए । लौटते समय जब उसकी नज़र वैन में बैठे हुए उन नन्हे-मुन्ने मासूम बच्चों पर पड़ी, जो ललचाई नज़रों से उसकी दुकान में लटके दिलबाग़, यामू, प्रिंस, हरसिंगार आदि के रंग-बिरंगे गुटखों को देख रहे थे, तो उसकी आँखों में अपने आप ही एक विशेष प्रकार की चमक आ गई ।


रावेंद्रकुमार रवि

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उसकी याद सजाने निकले : ग़ज़ल : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, June 30, 2010

उसकी याद सजाने निकले


जब तुम हमें लुभाने निकले!
हम तुम पर मिट जाने निकले!

तुम पर अच्छी ग़ज़ल पढ़ी तो,
हम दिल से कुछ गाने निकले!

भूल सके ना अब तक जिसको,
फिर से उसे भुलाने निकले!

कल ही जिससे मुँह फेरा था,
उसको गले लगाने निकले!

जिस लौ में ना जले पतंगा,
उस लौ को जलवाने निकले!

"रवि" को जिसने याद किया है,
उसकी याद सजाने निकले!

रावेंद्रकुमार रवि

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बनना ही पड़ेगा : नई कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, June 24, 2010

बनना ही पड़ेगा

करते ही एक क्लिक,
सुन लिए -
तुम्हारे मधुर बोल!
देख ली -
तुम्हारी मुस्कान की खिलन!
पढ़ लिए -
तुम्हारी आँखों के स्नेहिल भाव!
नहीं महसूस हो सकी -
तुम्हारी ऊष्मा!
मेरी सुगंध के लिए,
बनना ही पड़ेगा -
तुम्हें भ्रमर!


रावेंद्रकुमार रवि

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हमें नहीं पसंद है : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, June 17, 2010

लघुकथा -

हमें नहीं पसंद है


‘‘भइ, हमें आपकी बेटी पसंद है । आप अपनी बेटी से पूछ लीजिए कि उसे भी हमारा बेटा पसंद है या नहीं !''

लड़के के पिता ने जब यह कहा, तो ‘उनकी' बेटी ने लजाकर नजरें झुका लीं ।

यह देखकर लड़के की माँ बोलीं - ‘‘ठीक है ! अब हम सगाई की रस्‍म पूरी करके ही जाएँगे । अगले महीने की कोई तारीख्‍़ा शादी के लिए भी निश्‍चित कर लेंगे ... ... ... बेटी ! अपना हाथ आगे बढ़ाओ ... ... ... लो बेटा ! यह अँगूठी बहू की उँगली में पहना दो ... ... ... ''

‘‘लेकिन ... ... ... '' - उन्‍होंने तुरंत उनको रोक दिया ।

‘‘अरे भइ, पहनाने दीजिए !'' - लड़के के पिता ने अनुरोध किया ।

लेकिन वे बोले - ‘‘देखिए भाई साहब ! हमारी एक ही लड़की है । पहले सारी बातें तो तय कर लीजिए । बाद में सगाई भी हो जाएगी और शादी भी ।''

‘‘क्‍या मतलब ?''

‘‘यही कि आप लोगों की माँग क्‍या है ? वह भी पहले ही बता दें, तो ज़्यादा अच्‍छा रहेगा ।''

यह सुनकर लड़के के पिता हँसने लगे । बोले - ‘‘भगवान का दिया सब कुछ है हमारे पास । हमें तो बस आपकी बेटी चाहिए । हमारी कोई माँग नहीं है और न ही हम कुछ लेंगे ... ... ... बेटा ! तुम अँगूठी पहनाओ ।''

‘‘लेकिन फिर भी, हमें कुछ सोचने का मौका तो दीजिए ।'' - यह कहकर उन्‍होंने लड़के को फिर रोक दिया ।

‘‘ठीक है भइ, सोच-समझकर ही बताइएगा ।'' - बाहर की ओर साँस छोड़ते हुए लड़के के पिता ने अपनी पत्‍नी और बेटे की ओर चलने का इशारा किया ।

लड़की ने बड़ी हसरत-भरी निगाहों से उन्‍हें जाते हुए देखा ।

उनके जाने के बाद वे अपनी पत्‍नी से बोले - ‘‘बिना दहेज दिए बेटी की शादी करके बिरादरी में नाक नहीं कटानी हमें ! डाल देना एक पोस्‍टकार्ड और लिख देना - हमें नहीं पसंद है, उनका बेटा !''

--

रावेंद्रकुमार रवि


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हँसी का टुकड़ा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, May 15, 2010

हँसी का टुकड़ा


नथनी की परछाईं पर, सो
रहा हँसी का टुकड़ा!
उसे सुनाकर ख़ुश है लोरी,
गोरी तेरा मुखड़ा!

लट ने चूमा, उँगली ने छू
धीरे से सहलाया!
फिर उसको ओंठों पर धरकर
मेरी ओर उड़ाया!
मेरे पास पहुँचकर उसने
दूर कर दिया दुखड़ा!
नथनी की परछाईं पर ... ... .

मैंने भी उसके सुर से सुर
लेकर गीत बनाया!
फिर उसको अपनी साँसों की
ख़ुशबू से महकाया!
महक-महककर चमक आ गई,
दमक उठा है मुखड़ा!
नथनी की परछाईं पर ... ... .

रावेंद्रकुमार रवि

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ले हाथों में हाथ : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, May 8, 2010

ले हाथों में हाथ

पका हुआ जब पेड़ से,
चुआ रसीला आम।
झट से मैंने लिख दिया,
उस पर अपना नाम।।

ख़ूब पसीना बह रहा,
बनकर सबका मित्र।
ख़ुशबू इसकी लग रही,
जैसे महके इत्र।।

पूरी दोपहरी रहे,
गरमी से हम पस्त।
शाम सुहानी हो गई,
हवा चली जब मस्त।।

मन करता है छाँव के,
सदा रहूँ मैं साथ।
ऐसे ही बैठा रहूँ,
ले हाथों में हाथ।।

रावेंद्रकुमार रवि

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मज़दूर को देखिए : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, May 1, 2010

मज़दूर को देखिए -

बीड़ी के धुएँ में
साँसों को छौंककर
डेढ़ हड्डी पीठ पर
एक कुंतल गेहूँ लादे
रोटी के
दो क़तरों के लिए
अपनी साँझ देखती
ज़िंदगी को
लावा उगलती सड़कों पर
मृत कुत्ते की तरह
दिन-भर घसीटता है
और जब मिलते हैं
रोटी बनाने को
चार पैसे
तो दर्द से चीखती
पेशियों को
सुलाने के लिए
उन्हें दारू में घोलकर
आँतें सींच लेता है
ताकि कल फिर ... ... .
--
कविता : रावेंद्रकुमार रवि
----------------------------
चित्र : दिव्या शर्मा

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अनुपम उपहार : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, April 23, 2010

अनुपम उपहार










प्रत्येक
दृष्टि
-मिलन पर
तुम्हारे
द्वारा
दिया
गया
निश्छल
मुस्कान का
अनुपम
उपहार

मेरे
हृदयाकाश में
वैसे
ही
सजा
हुआ है,
जैसे
-
भोर
के
आँचल
में सजी
रवि
की
नव
रश्मियाँ!

रावेंद्रकुमार रवि

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