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उसकी याद सजाने निकले : ग़ज़ल : रावेंद्रकुमार रवि

>> Wednesday, June 30, 2010

उसकी याद सजाने निकले


जब तुम हमें लुभाने निकले!
हम तुम पर मिट जाने निकले!

तुम पर अच्छी ग़ज़ल पढ़ी तो,
हम दिल से कुछ गाने निकले!

भूल सके ना अब तक जिसको,
फिर से उसे भुलाने निकले!

कल ही जिससे मुँह फेरा था,
उसको गले लगाने निकले!

जिस लौ में ना जले पतंगा,
उस लौ को जलवाने निकले!

"रवि" को जिसने याद किया है,
उसकी याद सजाने निकले!

रावेंद्रकुमार रवि

3 टिप्पणियाँ:

sanu shukla June 30, 2010 at 8:20 PM  

बहुत सुंदर रचना...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक June 30, 2010 at 10:12 PM  

जब-जब भी हम गाने निकले!
वो तब साज बजाने निकले!
अटक गये जब बोल कभी तो-
उलझन वो सुलझाने निकले!

संगीता स्वरुप ( गीत ) July 2, 2010 at 12:14 PM  

खूबसूरत गज़ल..

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