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ब्याह रचाने को : रावेंद्रकुमार रवि

>> Friday, March 19, 2010

ब्याह रचाने को












मुझे
देखकर
जब
करती
है
नृत्य
तुम्हारी
अधर-परी!

उससे
ब्याह
रचाने
को
चल
पड़ती
मेरी
हृदय-परी!

रावेंद्रकुमार रवि

3 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक March 19, 2010 at 3:39 PM  

अधरपरी और हृदयपरी का,
मेल बहुत ही सुन्दर है!
प्रणय प्रतीकों का आपस में,
खेल बहुत ही सुन्दर है!

वन्दना अवस्थी दुबे March 22, 2010 at 11:27 PM  

जितनी सुन्दर तस्वीर, उतनी ही सुन्दर कविता!! बधाई.

संजय भास्कर April 1, 2010 at 1:17 PM  

देखकर
जब
करती
है
नृत्य
तुम्हारी
अधर-परी!

.........बहुत खूब, लाजबाब !

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