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मंदिर की ख़ुशबू : लघुकथा : रावेंद्रकुमार रवि

>> Monday, February 14, 2011

मंदिर की ख़ुशबू


घाटी में बसा हुआ गोपेश्वर पहाड़ियों के ऊपर बसे गाँवों से देखने पर बहुत सुंदर लगता है । घाटी के बीच में मोबाइल का टॉवर लगा हुआ है । टॉवर के पास भगवान शिव का मंदिर है । यहाँ के शिवजी गोपीनाथ के नाम से जाने जाते हैं । मंदिर काले पत्थरों से बना हुआ है । काले पत्थर धूप में चमचमा रहे हैं । गुनगुनी धूप बहुत अच्छी लग रही है । आसमान बिल्कुल साफ है । मंदिर के आँगन में महाशिवरात्रि का मेला लगा है । मेले का लाइव टेलीकास्ट चल रहा है । कुछ लोग घर में बैठे-बैठे टीवी पर मेला देख रहे हैं ।

चंदर भी टीवी देख रहा है । यह बात अलग है कि वह मेला कम देख रहा है और मेले में किसी को ढूँढ ज्यादा रहा है । दो घंटे बीत जाने के बाद भी जब उसे सुधा कहीं दिखाई नहीं दी, तो उसके सब्र का बाँध टूट गया । उसने अपने मोबाइल से सुधा का नंबर डायल किया - 9897614866 और कान से लगा लिया । एक ही डायल में फोन लग गया और उसे सुधा की हेलो ट्यून सुनाई देने लगी -


‘‘निगाहें निगाहों से मिलाकर तो देखो ... ...
नए लोगों से रिश्ता बनाकर तो देखो ... ...
जो है दिल में उसे कर दो बयाँ ... ...
ख़ुद को एक बार जताकर तो देखो ... ...
आसमाँ सिमट जाएगा तुम्हारे आगोश में ... ...
चाहत की बाहें फैलाकर तो देखो ... ...
दिल की बात बताकर तो देखो ... ... ’’

उधर सुधा के मोबाइल से भी इस गाने की रिंग-टोन बज उठी - ‘‘मेरे प्यार की आवाज पर चली आना ... ...’’
जैसे ही उसने यह एसाइन रिंग-टोन सुनी, वह समझ गई कि चंदर का फोन है । उसका मन भी गुनगुना उठा - ‘‘मैं आ रही हूँ प्यार की आवाज पर, ये प्यार-भरा नगमा तुम फिर से गुनगुनाना ... ... ’’


सुधा ने एक हाथ से बुरांश के लाल-गुलाबी फूलों से लदी टहनी पकड़ी । दूसरे हाथ में पकड़े मोबाइल को कान से लगाया और फोन रिसीव करते हुए बहुत मीठे-से पूछा - ‘‘क्या है ?’’

‘‘तृम मेला देखने क्यों नहीं आईं ?’’ - उधर से भी बहुत मीठी आवाज़ आई ।

फिर वे दोनों एक-दूसरे के कानों में रस घोलने लगे ।

‘‘तुम भी तो नहीं आए ?’’

‘‘तो क्या तुम मेले से बोल रही हो ?’’

‘‘नहीं, मैं तो टीवी में तुम्हें ढूँढ रही थी, पर तुम कहीं दिखाई ही नहीं दिए ।’’

‘‘धत्त तेरे की ! मैं भी तो तुम्हें टीवी में ढूँढ रहा था, पर तुम भी कहीं दिखाई नहीं दीं ।’’

‘‘मैंने सोचा, जब तुम दिखाई दोगे, तभी मैं भी आ जाऊँगी ।’’

‘‘मैंने भी तो यही सोचा ।’’

‘‘हो गए दोनों पागल !’’

‘‘अब क्या करें ?’’

‘‘सारा मेला तो टीवी पर ही देख लिया ... ... ’’

‘‘और अब तुम्हारी खिलखिलाहट भी सुन ली ... ... मिलने का क्या है ... ... अपना मेला तो कभी भी हो सकता है ... ... ’’

‘‘अरे, बुद्धू ! आज की बात ही कुछ और है । और फिर मंदिर की ख़ुशबू लेने के लिए तो मेले जाना ही पड़ेगा न ?’’

‘‘तो फिर देर किस बात की है ... ... आ जाओ जल्दी से ... ... थोड़ी-सी ख़ुशबू मुझे भी मिल जाएगी ... ... तुम्हारी ... ... मेरी साँसों को महकाने के लिए !’’

यह सुनते ही सुधा उड़ चली, मंदिर की ओर । किसी सुंदर-सी परी की तरह । पहाड़ी ढलान पर दौड़ते हुए ।

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रावेंद्रकुमार रवि
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2 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) February 16, 2011 at 7:34 PM  

प्रेम पर आधारित बहुत सुन्दर लघुकथा!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार February 24, 2011 at 10:33 PM  

प्रियवर रावेन्द्र रवि जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

मंदिर की ख़ुशबू अच्छी लघुकथा है , बधाई !


आज 24फरवरी को आपकी वैवाहिक वर्षगांठ है

आपने पोस्ट क्यों नहीं लगाई
… पार्टी कब और कहां देने वाले हैं ?

~*~ बधाई बधाई बधाई ! ~*~


♥~*~शुभविवाह की वर्षगांठ~*~♥
की
♥~*~हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !~*~♥


- राजेन्द्र स्वर्णकार

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