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समाधान : व्यंग्य कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, January 30, 2011



समाधान



"समधीजी!
कुछ तो सोचिए!
एक साथ इतना अधिक
दहेज मत माँगिए!"
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"कोई बात नहीं!
क्या सोचना?
सामान अभी ले लेंगे,
नोट किस्तों में दे देना!" 

रावेंद्रकुमार रवि 
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3 टिप्पणियाँ:

Coral January 31, 2011 at 8:05 AM  

सच है पर देना तो पड़ेगा ही ....

कड़वा सच है हमारे समाझ का

Kailash C Sharma January 31, 2011 at 3:06 PM  

बहुत कटु पर सार्थक व्यंग..

डॉ॰ मोनिका शर्मा February 2, 2011 at 5:24 AM  

कुछ ही शब्दों में सच का रेखांकन....

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