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ले हाथों में हाथ : रावेंद्रकुमार रवि

>> Saturday, May 8, 2010

ले हाथों में हाथ

पका हुआ जब पेड़ से,
चुआ रसीला आम।
झट से मैंने लिख दिया,
उस पर अपना नाम।।

ख़ूब पसीना बह रहा,
बनकर सबका मित्र।
ख़ुशबू इसकी लग रही,
जैसे महके इत्र।।

पूरी दोपहरी रहे,
गरमी से हम पस्त।
शाम सुहानी हो गई,
हवा चली जब मस्त।।

मन करता है छाँव के,
सदा रहूँ मैं साथ।
ऐसे ही बैठा रहूँ,
ले हाथों में हाथ।।

रावेंद्रकुमार रवि

9 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार May 8, 2010 at 10:37 PM  

फलॊं का राजा आम मेरा सबसे पसंदीदा फल है। घर (गांव में) पर तो आम के पेड़ पर ही चढ कर पके आम तोड़ता और खाता रहा हूँ। पर इस महा नगरीय जीवन में कार्बाइड के पके आमों से संतोष कर लेना पड़ता है। हां कोलकाता के हीम सागर आम का जवाब नहीं और आम पर कविता हो और मैं छोड़ दूँ … ऐसा हो नहीं सकता। रवि जी आपकी इस कविता का जवाब नहीं।

मनोज कुमार May 8, 2010 at 10:38 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 09.05.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://charchamanch.blogspot.com/

दिलीप May 8, 2010 at 11:25 PM  

bahut khoob...

राज भाटिय़ा May 8, 2010 at 11:56 PM  

बिलकुल आमो के रस की तरह से लगी आप की यह कविता बहुत मिठ्ठी

Suman May 9, 2010 at 6:29 AM  

nice

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक May 9, 2010 at 7:38 AM  

सुन्दर दोहे, मन को मोहे!
मातृ-दिवस की बहुत-बहुत बधाई!
ममतामयी माँ को प्रणाम!

संजय भास्कर May 10, 2010 at 6:19 PM  

बहुत सुंदर ....रचना....

sangeeta swarup May 10, 2010 at 8:36 PM  

रसीले आम की तरह रसीली रचना....खूबसूरत

sidheshwer May 10, 2010 at 8:53 PM  

बहुत बढ़िया !

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