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कुहरे में भोर हुई : नवगीत : रावेंद्रकुमार रवि

>> Sunday, January 2, 2011

कुहरे में भोर हुई


कुहरे में
भोर हुई, दोपहरी कुहरे में!
कुहरे में शाम हुई, रात हुई कुहरे में!

कलियों के
खिलने की, आहट भी थमी हुई!
तितली के पंखों की, हरक़त भी रुकी हुई!
मधुमक्खी गुप-चुप है, चिड़िया भी डरी हुई!
भौंरे के
गीतों की, मात हुई कुहरे में!

सरसों कुछ
रूठी है, गेहूँ गुस्साया है!
तभी तो पसीना हर, पत्ती पर आया है!
खेतों में सिहरन का, परचम लहराया है!
मौसम पर
ठंडक की, घात हुई कुहरे में!

घर में
हम क़ैद हुए, ठंड-भरी हवा चले!
टोप पड़े सिर पर तो,मफ़लर भी पड़े गले!
दौड़ रहे दबकर हम, कपड़ों के बोझ तले!
कपड़ों की
संख्या भी, सात हुई कुहरे में!

भुने हुए
आलू की, गंध बहुत मन-भाती!
चाय-भरे कुल्हड़ से, गर्माहट मिल जाती!
आँखों ही आँखों में, बात नई बन जाती!
साँसों से
साँसों की, बात हुई कुहरे में!

रावेंद्रकुमार रवि

1 टिप्पणियाँ:

mridula pradhan January 2, 2011 at 9:36 PM  

"कुहरे में भोर हुई" bahut achchi lagi.

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