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जब भी मन करता है : प्रणय कविता : रावेंद्रकुमार रवि

>> Monday, December 5, 2011


जब भी मन करता है
तुम मुझे
अपनी तरफ देखता देखकर
अक्सर अपना मुँह
घुमा लेती हो!

क्या तुम जानती हो
कि मैं भी
चाहता हूँ
कि तुम ऐसा ही करो!

और चाहता हूँ
कि तुम यह कभी न जान पाओ
कि तुम मुझे साइड से
ज़्यादा सुंदर लगती हो!

क्योंकि मेरा दिल
तुम्हारे ख़ूबसूरत कान में सजे
झुमके में बैठकर
झूला झूलने लगता है!

और जब भी
मन करता है
प्यार से महकते हुए
तुम्हारे गालों को चूम लेता है! 

रावेंद्रकुमार रवि

7 टिप्पणियाँ:

डॉ॰ मोनिका शर्मा December 5, 2011 at 10:37 PM  

सुंदर भाव...

डॉ. नागेश पांडेय "संजय" December 6, 2011 at 2:01 PM  

बड़े सहज, उदार
और कृपण भी हो तुम।

डॉ. नागेश पांडेय "संजय" December 6, 2011 at 2:07 PM  

कविता सम्मोहक है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) December 6, 2011 at 9:40 PM  

यह रचना वाकई मे फूल से भी कोमल भावों से परिपूर्ण है!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) December 8, 2011 at 7:42 AM  

रवि जी!
आपकी प्रणय कविता की चर्चा तो आज के चर्चा मंच पर भी है!

sidheshwer December 11, 2011 at 9:45 AM  

बना रहे यह प्रेम और उसे व्यक्त करने का मौन!

Monika Jain "मिष्ठी" January 12, 2012 at 5:10 PM  

pyar ko abhivyakt karne ka sundar andaz..
Welcome to मिश्री की डली ज़िंदगी हो चली

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