नन्हे दोस्तों को समर्पित मेरा ब्लॉग

तुमसे बिछुड़कर : रावेंद्रकुमार रवि

>> Thursday, April 1, 2010


तुमसे बिछुड़कर











कहते हैं


विश्व की समस्त ऊर्जा


संरक्षित है!



लेकिन


तुमसे बिछुड़कर


मुझे ऐसा लगा -



जैसे वो


मेरी


बोझिल पलकों में


समाने के बाद



आँखों से


आँसू के रूप में


शून्य बनकर


टपक पड़ी


और


नष्ट हो गई है!



रावेंद्रकुमार रवि

14 टिप्पणियाँ:

महेन्द्र मिश्र April 1, 2010 at 12:51 PM  

भावपूर्ण रचना अभिव्यक्ति ....

संजय भास्कर April 1, 2010 at 1:12 PM  

एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब

Amitraghat April 1, 2010 at 3:05 PM  

"बहुत अच्छी कविता, ऊर्जा का तार्किक उपयोग....."

सीमा सचदेव April 1, 2010 at 4:47 PM  

भावपूर्ण रचना के लिए बधाई

Babli April 1, 2010 at 6:24 PM  

बहुत ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने उम्दा रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

अमिताभ मीत April 1, 2010 at 6:37 PM  

बढ़िया है भाई !

Apanatva April 1, 2010 at 8:37 PM  

aapne tippanee chodee accha laga iseese aapke blog ka bhee pata chala..............:)
badee sunder bhav kee sunder abhivykti lagee ise rachana me........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक April 1, 2010 at 11:09 PM  

मोती टपक रहा है सच्चा,
इसको आँसू नाम न देना!
शबनम की ढलती बून्दों को,
पलकों में विश्राम न देना!!
-- --
जितना सुन्दर सुमन!
उतनी ही सुन्दर रचना!!

Udan Tashtari April 2, 2010 at 6:42 AM  

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!

संजय भास्कर April 2, 2010 at 7:38 AM  

आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

राकेश कौशिक April 3, 2010 at 10:49 PM  

शब्द, भाव और तस्वीर सुंदर सामंजस्य.

माधव April 5, 2010 at 4:30 PM  

आपकी हिन्दी जबरदस्त है , follower को हिन्दी में "अभ्यागत" कहते है पहली बार पता चला. आपको हिन्दी शब्द सिखाने वाला एक ब्लॉग शुरु करना चाहिए.
पापा आप के फैन बन गए है . सर आपने चर्चा मंच पर मेरे बारे में लिखा , मुझे बहुत खुशी हुई ,आपका स्नेह मुझे मिलता रहे , इसी आशा से धन्यवाद !

रावेंद्रकुमार रवि April 6, 2010 at 12:03 AM  

प्रिय माधव!
follower को हिंदी में "अभ्यागत" नहीं कहते हैं,
"अभ्यागत" का मतलब है -
मेहमान या अतिथि!
मेरे ब्लॉग्स पर आनेवाले सभी लोग
मेरे लिए अतिथि-जैसे ही होते हैं,
इसलिए ऐसा लिख रखा है!
--
हिंदी सीखने-सिखाने के लिए भी
मेरा एक ब्लॉग है -
>हिंदी का शृंगार!

anita saxena April 9, 2010 at 9:49 AM  

बहुत भावपूर्ण रचना ..अच्छा लगा आपका क्रियान्वन देख कर ..

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